पाकिस्तान भर में यौम-ए-अली (र.अ.) शोक जुलूसों और कड़ी सुरक्षा के बीच मनाया गया
- इंटरनेशनल
- 11 Mar, 2026 07:12 PM (Asia/Kolkata)
लाहौर, 11 मार्च 2026 , नजराना टाइम्स पाकिस्तान में बुधवार (21 रमज़ान 1447 हिजरी) को इस्लाम के चौथे खलीफा और हज़रत मुहम्मद (सल्ल.) के चचेरे भाई तथा दामाद हज़रत अली इब्न अबी तालिब (र.अ.) की शहादत की बरसी पूरे धार्मिक सम्मान के साथ मनाई गई। देशभर में शोक जुलूस, मजलिसें और मातमी रस्में आयोजित की गईं, जिनमें लाखों लोगों ने भाग लिया। व्यापक सुरक्षा इंतज़ामों के चलते दिन शांतिपूर्ण रहा और किसी बड़ी घटना की सूचना नहीं मिली।
लाहौर:केंद्रीय जुलूस पुराने शहर में मोची गेट के पास स्थित ऐतिहासिक मुबारक हवेली से शुरू हुआ और पारंपरिक मार्गों से गुजरते हुए सूर्यास्त पर करबला गामे शाह में समाप्त हुआ। हजारों शोकाकुल लोगों ने हज़रत अली (र.अ.) की न्याय, बहादुरी और इस्लाम के प्रति समर्पण की विरासत को श्रद्धांजलि दी। पंजाब पुलिस ने हजारों जवान तैनात किए, जबकि CCTV कैमरे, ड्रोन निगरानी और सुरक्षा चौकियां भी लगाई गईं। पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज़ ने पहले ही सभी जुलूसों और मजलिसों के लिए कड़े सुरक्षा प्रबंध करने के निर्देश दिए थे।
कराची:केंद्रीय यौम-ए-अली मजलिस निश्तर पार्क में आयोजित हुई, जिसमें बड़ी संख्या में लोग शामिल हुए। इसके बाद मुख्य जुलूस निर्धारित मार्गों से होता हुआ खारादर स्थित हुसैनिया ईरानी इमामबाड़ा में समाप्त हुआ। पूरे शहर में 22,000 से अधिक पुलिसकर्मियों के साथ रेंजर्स और अन्य अर्धसैनिक बल तैनात किए गए। सदर और आसपास के इलाकों में कंटेनरों के माध्यम से सुरक्षा घेरा बनाया गया।
इस्लामाबाद, रावलपिंडी और अन्य शहर:
इस्लामाबाद, रावलपिंडी, पेशावर, क्वेटा, मुल्तान तथा आज़ाद जम्मू-कश्मीर और गिलगित-बाल्टिस्तान में भी शोक जुलूस और मजलिसें आयोजित की गईं। स्थानीय प्रशासन के अनुसार सभी कार्यक्रम शांतिपूर्ण ढंग से संपन्न हुए।
सुरक्षा प्रबंध:कानून-व्यवस्था एजेंसियों ने देशभर में बहु-स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था लागू की, जिसमें हजारों पुलिस और अर्धसैनिक बलों की तैनाती, वॉक-थ्रू गेट, सुरक्षा चौकियां, ड्रोन निगरानी, CCTV मॉनिटरिंग और मोबाइल आपातकालीन टीमें शामिल थीं। आधिकारिक रिपोर्टों के अनुसार देश में कहीं भी कोई बड़ी सुरक्षा घटना नहीं हुई।
दिन का महत्व:हज़रत अली (र.अ.) 21 रमज़ान 40 हिजरी (661 ईस्वी) को कूफ़ा में फ़ज्र की नमाज़ के दौरान हुए हमले में शहीद हुए थे। अपनी बुद्धिमत्ता, न्याय और वीरता के लिए वे पूरे मुस्लिम जगत में अत्यंत सम्मानित हैं। पाकिस्तान भर में आयोजित मजलिसों में विद्वानों ने लोगों से उनकी शिक्षाओं—न्याय, ईमानदारी, करुणा और एकता—को अपनाने की अपील की।
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