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ननकाना साहिब जिले में पांचवें सिख गुरु श्री गुरु अर्जन साहिब जी की स्मृति में बना ऐतिहासिक गुरुद्वारा ध्वस्त, स्थल पर बनी हवेली

30 Aug, 2026 01:30 AM

लाहौर — नज़राना टाइम्स
रिपोर्ट: अली इमरान चट्ठा

पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के ननकाना साहिब जिले के गांव चिट्टी जातरी में पांचवें सिख गुरु श्री गुरु अर्जन साहिब जी की यात्रा से जुड़ा एक ऐतिहासिक गुरुद्वारा कथित तौर पर ध्वस्त कर दिया गया है। इस ऐतिहासिक स्थल पर अब एक हवेली बनी हुई है।स्थान: गांव चिट्टी जातरी, जिला ननकाना साहिब, पंजाब, पाकिस्तान

GPS निर्देशांक: 31°14’30.2”N 73°50’49.6”E

हाल ही में जीवे सांझा पंजाब (Jeevay Sanjha Punjab-JSP) की एक शोध टीम ने इस ऐतिहासिक स्थल का दौरा किया। टीम का नेतृत्व प्रसिद्ध इतिहासकार एवं लेखक प्रोफेसर डॉ. तरनजीत सिंह बुटालिया, प्रोफेसर ऑफ सिविल इंजीनियरिंग, द ओहायो स्टेट यूनिवर्सिटी, अमेरिका ने किया।

टीम ने भारत-पाकिस्तान विभाजन से पहले के सिख ऐतिहासिक अभिलेखों के आधार पर इस गुरुद्वारे के वास्तविक स्थान की पहचान करने और उससे जुड़े इतिहास का दस्तावेजीकरण करने के उद्देश्य से यहां शोध किया।
यह गुरुद्वारा गांव चिट्टी जातरी में श्री गुरु अर्जन साहिब जी की यात्रा की स्मृति में स्थापित किया गया था।
सिख इतिहासकार सरदार धन्ना सिंह पटियालवी ने वर्ष 1933 में इस स्थल का दौरा किया था और अपनी डायरी में गुरुद्वारे से संबंधित महत्वपूर्ण विवरण दर्ज किए थे। उनके अभिलेखों में उस समय नवनिर्मित लंगरखाने की एक तस्वीर भी शामिल थी।
JSP की शोध टीम द्वारा जुटाई गई जानकारी के अनुसार, गुरुद्वारे का मंजी साहिब छोटी ईंटों से निर्मित था। उस पर एक बड़ा गुंबद और एक विशाल बरामदा था। इसके साथ स्थित लंगरखाना अपेक्षाकृत बड़े आकार की ईंटों से बनाया गया था।
शोध टीम ने राणा मोहम्मद अनवर से भी मुलाकात की, जो वर्तमान में पूर्व गुरुद्वारा स्थल के ठीक पीछे स्थित एक प्लॉट पर रहते हैं।

रिपोर्ट के अनुसार, राणा मोहम्मद अनवर ने सरदार धन्ना सिंह पटियालवी द्वारा 1933 में दर्ज की गई तस्वीर को पहचानते हुए इसे इसी ऐतिहासिक गुरुद्वारे के लंगरखाने की तस्वीर बताया। उन्होंने स्थल से जुड़े कई अन्य ऐतिहासिक विवरणों की भी पुष्टि की।

उनके अनुसार, गुरुद्वारा और लंगरखाना कई वर्षों तक वीरान और उपेक्षित अवस्था में रहे। लगभग दो से तीन वर्ष पहले दोनों इमारतों को ध्वस्त कर दिया गया।

अब उस ऐतिहासिक स्थल पर एक इमारत खड़ी है, जिसे स्थानीय लोग “डोगरां दी हवेली” के नाम से जानते हैं।

JSP की शोध टीम को पुराने गुरुद्वारे के संभावित अवशेष के रूप में केवल एक निशानी मिली। यह नक्काशीदार पुरानी ईंट है, जिसे हवेली के मुख्य प्रवेश द्वार के दाईं ओर बनी चारदीवारी में लगाया गया है।

ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, गुरुद्वारे का लंगरखाना 1930 के दशक में बाबा बिबेका सिंह द्वारा बनवाया गया था। इस स्थल पर हर वर्ष 1 और 2 अस्सू को धार्मिक मेला भी आयोजित किया जाता था।

1930 के दशक में इस क्षेत्र में नहरें आने के बाद आसपास की कृषि भूमि में जलभराव की समस्या पैदा हो गई थी। इससे इलाके की सिख आबादी में भी बदलाव आने लगा। हालांकि शुरुआत में कई सिख परिवार गांव में बने रहे, लेकिन 1947 में भारत-पाकिस्तान विभाजन के बाद अधिकांश सिख परिवार यहां से चले गए।

ऐतिहासिक गुरुद्वारे को कथित तौर पर ध्वस्त किए जाने का मामला सामने आने के बाद पाकिस्तान में मौजूद सिख धार्मिक और ऐतिहासिक विरासत के संरक्षण को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल उठे हैं।

पाकिस्तान सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (PSGPC) से आग्रह किया गया है कि वह इस मामले को संबंधित सरकारी अधिकारियों के समक्ष उठाए, गुरुद्वारे को कथित तौर पर ध्वस्त किए जाने की जांच करवाए और उस जमीन की ऐतिहासिक एवं कानूनी स्थिति का पता लगाए, जिस पर वर्तमान हवेली का निर्माण किया गया है।

चिट्टी जातरी का यह ऐतिहासिक गुरुद्वारा पाकिस्तान में सिख विरासत से जुड़े उन महत्वपूर्ण स्थलों की एक और मिसाल है, जो समय के साथ लुप्त हो गए, जिनका स्वरूप बदल दिया गया या जो आज भी अपनी ऐतिहासिक पहचान खोने के खतरे में हैं।

यह मामला पाकिस्तान में मौजूद सिख धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत के व्यवस्थित दस्तावेजीकरण, कानूनी पहचान और संरक्षण के लिए ठोस व्यवस्था किए जाने की आवश्यकता को एक बार फिर रेखांकित करता है।

Posted By: Ali Imran Chattha

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