भगवान श्री जगन्नाथ जी की भावपूर्ण विदाई: नम आँखों से भक्तों ने कहा— "प्रभु! अगले वर्ष फिर शीघ्र पधारिए…"
- धार्मिक
- 21 Jul, 2026 03:51 PM (Asia/Kolkata)
कपूरथला 21 जुलाई गौरव मढिया
श्री श्री राधा श्यामसुंदर मंदिर, इस्कॉन कपूरथला द्वारा आयोजित भगवान श्री जगन्नाथ, बलदेव एवं सुभद्रा महारानी की 51 दिवसीय दिव्य रथयात्रा महोत्सव का समापन अत्यंत भावपूर्ण वातावरण में हुआ। उन्नीस जुलाई को भव्य रथयात्रा की ऐतिहासिक सफलता के पश्चात बीस जुलाई को भगवान की विदाई का वह करुणामय क्षण उपस्थित हुआ, जब हजारों भक्तों की आँखें नम थीं, कंठ रुंध गए थे और प्रत्येक हृदय केवल एक ही प्रार्थना कर रहा था— "हे प्रभु! अगले वर्ष फिर शीघ्र पधारिए और हमें पुनः अपनी सेवा का सौभाग्य प्रदान कीजिए।"

लगातार 51 दिनों तक इस्कॉन कपूरथला के भक्तों ने भगवान श्री जगन्नाथ जी को घर-घर पहुँचाकर संपूर्ण नगर को हरिनाम, भक्ति और प्रेम के अमृत से सराबोर कर दिया। कपूरथला का ऐसा कोई वर्ग नहीं बचा जिसने भगवान का प्रेमपूर्वक स्वागत न किया हो। प्रत्येक मोहल्ले, प्रत्येक परिवार और प्रत्येक भक्त ने अपने सामर्थ्य से बढ़कर भगवान की सेवा का सौभाग्य प्राप्त किया। कहीं भव्य महाआरती हुई, कहीं छप्पन भोग अर्पित किए गए, कहीं पुष्पवर्षा हुई, तो कहीं संपूर्ण परिवार भगवान के श्रीचरणों में समर्पित होकर प्रेमाश्रु बहाता रहा।
रथयात्रा के अगले दिन प्रातःकाल मंगल आरती प्रातः 5 बजे से ही मंदिर का वातावरण विरह-भाव से भर उठा। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रत्येक भक्त का हृदय भगवान के वियोग की अनुभूति कर रहा हो। भक्त बार-बार भगवान के श्रीमुख का दर्शन करते, उनकी अनुपम छवि को निहारते और मन ही मन उनसे प्रार्थना करते रहे। दिनभर भगवान का दिव्य श्रृंगार, आरतियाँ, भोग-प्रसाद अर्पण तथा विविध सेवाएँ निरंतर चलती रहीं।

नगर के अनेक श्रद्धालु दिनभर मंदिर पहुँचते रहे। कोई प्रसाद अर्पित कर रहा था, कोई पुष्पमालाएँ अर्पित कर रहा था, तो कोई केवल भगवान के दर्शन कर अपने नेत्रों को धन्य बना रहा था। किंतु प्रत्येक भक्त की दृष्टि भगवान श्री जगन्नाथ जी पर ही स्थिर थी, क्योंकि विरह की भावना प्रत्येक हृदय को भीतर तक स्पर्श कर रही थी।
प्रातः लगभग 10:30 बजे भगवान की महाविदाई की पावन रस्म प्रारंभ हुई। जैसे ही जगद्गुरु श्रील प्रभुपाद के विग्रह को भक्तों ने प्रेमपूर्वक उठाया, अनेक भक्त अपने आँसुओं को रोक न सके। तत्पश्चात भगवान बलदेव जी को जैसे ही भक्तों ने अपने हाथों में लिया, सम्पूर्ण वातावरण "जय बलराम!" के गगनभेदी जयघोष से गूँज उठा। वृद्ध, युवा, माताएँ, बहनें और छोटे-छोटे बालक—सभी भावविभोर होकर प्रभु के नाम का संकीर्तन करने लगे।

जब सुभद्रा महारानी की सेवा का अवसर आया, तब अनेक भक्तों की आँखों से प्रेमाश्रुओं की धारा बह निकली। और फिर वह क्षण आया जिसकी कल्पना मात्र से हृदय भर आता है। जैसे ही भगवान श्री जगन्नाथ जी को उनके सिंहासन से उठाया गया, सम्पूर्ण मंदिर "जय जगन्नाथ! जय जगन्नाथ!" के घोष से गूँज उठा। अनेक भक्तों का गला भर आया, शरीर रोमांचित हो उठा और आँखों से अश्रुधारा अविरल बहने लगी। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो प्रत्येक भक्त अपने हृदय के प्राणों को विदा कर रहा हो।

मंदिर के बाहर भगवान के लिए फूलों से सुसज्जित वाहन पहले से ही तैयार खड़े थे। दिव्य आसन सजाए जा चुके थे। सेवकगण श्रद्धा और सावधानी के साथ भगवान के विग्रहों को वाहनों तक लेकर पहुँचे। अनेक भक्त दण्डवत होकर प्रभु को प्रणाम कर रहे थे। कोई प्रभु के चरणों का अंतिम स्पर्श करने का प्रयास कर रहा था, कोई वाहन को थामे खड़ा था, तो कोई दूर खड़ा नम नेत्रों से केवल भगवान की छवि को अपने हृदय में बसाने का प्रयास कर रहा था।
हर भक्त की वाणी से एक ही पुकार निकल रही थी—
“हे जगन्नाथ! अगले वर्ष शीघ्र पधारिए। हमें पुनः अपनी सेवा का अवसर अवश्य प्रदान कीजिए।”
जब भगवान के वाहन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे, तब अनेक भक्तों ने प्रेमपूर्वक वाहनों को धक्का देकर अपनी भावनाएँ व्यक्त कीं। यह केवल विदाई नहीं थी; यह जीव और भगवान के शाश्वत प्रेम का अद्भुत संगम था। इस प्रकार प्रेम, सेवा, हरिनाम और समर्पण से परिपूर्ण 51 दिवसीय यह महायज्ञ पूर्ण

इस अवसर पर इस्कॉन कपूरथला के ब्रजभक्त एच.जी. नकुल प्रभु जी ने समस्त कपूरथला वासियों, प्रशासन, राजनीतिक प्रतिनिधियों, धार्मिक एवं सामाजिक संस्थाओं तथा प्रत्येक सहयोगी परिवार का हृदय की गहराइयों से आभार व्यक्त किया। उन्होंने कहा कि इतना विशाल आध्यात्मिक महोत्सव किसी एक व्यक्ति के प्रयास से संभव नहीं हो सकता। यह भगवान श्री जगन्नाथ जी की असीम कृपा तथा समस्त नगरवासियों के प्रेम, सहयोग और सेवा-भाव का दिव्य परिणाम है।

उन्होंने विशेष रूप से उन सभी परिवारों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जिन्होंने भगवान को अपने घरों में विराजमान किया, भव्य आरतियाँ आयोजित कीं, छप्पन भोग अर्पित किए, पुष्पमालाएँ समर्पित कीं, लड्डू सेवा, प्रसाद सेवा, श्रृंगार सेवा, वाहन सेवा तथा विविध प्रकार की तन-मन-धन से सेवाएँ अर्पित कीं। उन्होंने कहा कि प्रत्येक सेवा भगवान के श्रीचरणों में अमूल्य है और भगवान अपने प्रत्येक सेवक के प्रेम को अवश्य स्वीकार करते हैं।
इस अवसर पर भगवान के निजी पुजारियों ने भी भावविभोर होकर कहा कि "कपूरथला में भगवान श्री जगन्नाथ जी के प्रति भक्तों का जो प्रेम, समर्पण और सेवा हमने देखी है, उसे देखकर ऐसा अनुभव हो रहा है मानो स्वयं भगवान यहाँ से जाना ही नहीं चाहते। भगवान अत्यंत प्रसन्न हैं।" पुजारियों के मुखारविंद से निकले इन शब्दों को सुनकर उपस्थित समस्त भक्त पुनः भावविह्वल हो उठे।
अंत में एच.जी. नकुल प्रभु जी एवं ब्रजा माता जी ने समस्त कपूरथला वासियों को कोटि-कोटि प्रणाम करते हुए प्रार्थना की—
"हम हृदय से उन सभी भक्तों, सेवकों, दानदाताओं, यजमान परिवारों, स्वयंसेवकों, प्रशासन, मीडिया, पुलिस विभाग, सामाजिक संस्थाओं तथा प्रत्येक नगरवासी के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं, जिन्होंने इस 51 दिवसीय दिव्य महायज्ञ को सफल बनाने में प्रत्यक्ष अथवा अप्रत्यक्ष रूप से अपना अमूल्य योगदान दिया। भगवान श्री जगन्नाथ, बलदेव एवं सुभद्रा महारानी आप सभी पर अपनी असीम कृपा, भक्ति, स्वास्थ्य, सुख, समृद्धि एवं श्रीकृष्ण प्रेम की वर्षा करें। आप सभी के जीवन में हरिनाम का प्रकाश सदैव बना रहे। अगले वर्ष पुनः हम सभी इसी प्रेम, उत्साह और भक्ति के साथ भगवान श्री जगन्नाथ जी का स्वागत करेंगे। जय जगन्नाथ!"
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