अमेरिका ने Cognizant की इमिग्रेशन फाइलिंग पर बढ़ाई सख्ती, H-1B नियमों की भी कड़ी जांच
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- (Asia/Kolkata)
संघीय जांच के बीच नई PERM फाइलिंग पर रोक; Cognizant के सभी H-1B वीज़ा पर प्रतिबंध नहीं
वॉशिंगटन (नज़राना टाइम्स | मॉनिटरिंग डेस्क): अमेरिका ने रोजगार-आधारित इमिग्रेशन व्यवस्था की जांच और कड़ी कर दी है। इसी क्रम में प्रमुख टेक्नोलॉजी कंपनी Cognizant Technology Solutions की नई PERM लेबर सर्टिफिकेशन फाइलिंग को संघीय जांच के दौरान निलंबित किया गया है।
यह कार्रवाई रोजगार-आधारित वीज़ा कार्यक्रमों में कथित धोखाधड़ी और दुरुपयोग की व्यापक जांच का हिस्सा है।
हालांकि, इस कदम को Cognizant से जुड़े सभी H-1B वीज़ा पर पूर्ण प्रतिबंध के रूप में देखना सही नहीं होगा।
PERM वह लेबर सर्टिफिकेशन प्रक्रिया है जिसके तहत अमेरिकी कंपनियां विदेशी कर्मचारियों को रोजगार-आधारित स्थायी निवास, यानी ग्रीन कार्ड, के लिए प्रायोजित करने की प्रक्रिया आगे बढ़ाती हैं। यह H-1B अस्थायी कुशल-कर्मचारी वीज़ा कार्यक्रम से अलग व्यवस्था है।
इसलिए PERM फाइलिंग निलंबित होने से मौजूदा H-1B वीज़ा अपने-आप रद्द नहीं होते।
भारतीय टेक पेशेवरों के लिए बड़ा असर
अमेरिकी इमिग्रेशन नीति में हो रहे बदलावों का सबसे अधिक असर भारतीय टेक्नोलॉजी पेशेवरों पर पड़ सकता है, क्योंकि H-1B कार्यक्रम में भारतीय नागरिकों की हिस्सेदारी सबसे अधिक है।
अमेरिकी नागरिकता एवं इमिग्रेशन सेवा (USCIS) की वित्त वर्ष 2024 की आधिकारिक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में जन्मे 2,83,755 H-1B लाभार्थियों की याचिकाएं मंजूर हुईं, जो कुल मंजूर लाभार्थियों का लगभग 71 प्रतिशत है।
चीन 46,722 लाभार्थियों, यानी करीब 11.7 प्रतिशत हिस्सेदारी के साथ दूसरे स्थान पर रहा।
इन आंकड़ों को समझते समय यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये मंजूर H-1B याचिकाओं और लाभार्थियों से संबंधित हैं। इन्हें उसी वर्ष अमेरिका में वास्तव में प्रवेश करने वाले H-1B कर्मचारियों की संख्या नहीं माना जा सकता।
वीज़ा जारी होना, H-1B याचिका की मंजूरी, अमेरिका में प्रवेश और पहले से अमेरिका में मौजूद व्यक्ति की इमिग्रेशन स्थिति में बदलाव—ये अलग-अलग आंकड़े और प्रक्रियाएं हैं।
इसी कारण सोशल मीडिया पर चल रहे अलग-अलग आंकड़ों की USCIS के वार्षिक H-1B आंकड़ों से सीधी तुलना करना भ्रामक हो सकता है।
H-1B के लिए 103,265 डॉलर अतिरिक्त शुल्क का प्रस्ताव
इसी बीच अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने कुछ H-1B याचिकाओं पर बहुत बड़ा अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव भी रखा है।
संघीय नियम बनाने की प्रक्रिया के तहत जारी प्रस्ताव में cap-subject H-1B petitions पर 103,265 डॉलर का अतिरिक्त शुल्क लगाने की बात कही गई है।
लेकिन सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह शुल्क अभी लागू नहीं हुआ है। यह फिलहाल एक प्रस्ताव है।
यह भी सभी H-1B याचिकाओं पर लागू करने का प्रस्ताव नहीं है, बल्कि विशेष रूप से वार्षिक H-1B सीमा के तहत आने वाली याचिकाओं पर लागू होगा।
यह प्रस्ताव 2025 में राष्ट्रपति की घोषणा के तहत सामने आई 100,000 डॉलर की भुगतान आवश्यकता से भी अलग है।
इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि अमेरिकी सरकार ने H-1B वीज़ा के लिए 200,000 डॉलर की फीस तय कर दी है। आधिकारिक रूप से दर्ज नया प्रस्ताव 103,265 डॉलर के अतिरिक्त शुल्क का है और वह भी अभी अंतिम रूप से लागू नहीं हुआ।
Cognizant मामला व्यापक जांच का हिस्सा
Cognizant से जुड़ी कार्रवाई अमेरिका की उस व्यापक मुहिम का हिस्सा है जिसमें यह जांचा जा रहा है कि कहीं रोजगार-आधारित इमिग्रेशन कार्यक्रमों का इस्तेमाल अमेरिकी कर्मचारियों के रोजगार अवसरों या वेतन को नुकसान पहुंचाने के लिए तो नहीं किया जा रहा।
इस मामले में अलग-अलग इमिग्रेशन प्रक्रियाओं के बीच अंतर समझना भी जरूरी है।
Labour Condition Application (LCA), H-1B petition, अमेरिकी दूतावास या वाणिज्य दूतावास द्वारा वीज़ा जारी करना, अमेरिका में प्रवेश और PERM labour certification—ये सभी अलग कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रियाएं हैं।
इसलिए इनके आंकड़ों को एक ही श्रेणी के कर्मचारियों की संख्या मानकर जोड़ना या सीधे तुलना करना उचित नहीं है।
पूरे अमेरिका में PERM प्रक्रिया जारी
Cognizant से जुड़ी कार्रवाई के बावजूद अमेरिका में PERM कार्यक्रम देशभर में बंद नहीं किया गया है।
अमेरिकी श्रम विभाग के 31 अगस्त 2026 तक के आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, नवंबर 2025 priority dates वाली PERM applications analyst review में पहुंच चुकी थीं।
इससे स्पष्ट है कि PERM प्रक्रिया राष्ट्रीय स्तर पर जारी है और Cognizant से जुड़ी कार्रवाई को पूरे अमेरिकी PERM कार्यक्रम के निलंबन के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
भारतीय IT पेशेवरों के लिए राह हो सकती है कठिन
अमेरिका में बढ़ती जांच, कंपनियों पर कड़े नियम और H-1B याचिकाओं से जुड़ी संभावित भारी फीस विदेशी कुशल कर्मचारियों के लिए अमेरिकी नौकरी और बाद में स्थायी निवास हासिल करने की राह को और मुश्किल बना सकती है।
इसका सबसे ज्यादा असर भारतीय टेक्नोलॉजी पेशेवरों पर पड़ने की संभावना है, क्योंकि वित्त वर्ष 2024 में हर दस मंजूर H-1B लाभार्थियों में लगभग सात भारत में जन्मे थे।
अमेरिका अभी भी दुनिया के उच्च-कुशल पेशेवरों के लिए सबसे बड़े रोजगार स्थलों में से एक है, लेकिन हाल के कदम यह संकेत दे रहे हैं कि आगे कंपनियों और विदेशी कर्मचारियों दोनों को अधिक जांच, सख्त नियमों और संभावित रूप से काफी अधिक लागत का सामना करना पड़ सकता है।
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