लाहौर के थ्री मस्कटियर्स: इतिहास और गलत मिथक लेखक: डॉ. तरनजीत सिंह बुटालिया
16 Mar, 2026 08:04 PM
सैयद मुहम्मद लतीफ ने अपनी 1891 की पुस्तक "Lahore, Its History, Architectural Remains and Antiquities" में बार-बार यह दावा किया कि महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर के किले और अन्य स्थानों पर नई संरचनाएं बनाने के लिए मुगल काल की मस्जिदों और मकबरों को नुकसान पहुँचाया।
जबकि, समकालीन फारसी रिकॉर्ड इस बात के गवाह हैं कि महाराजा रणजीत सिंह ने लाहौर की मस्जिदों और दरगाहों (जैसे दाता दरबार, बादशाही मस्जिद, वजीर खान मस्जिद) को संरक्षण दिया था।
थ्री मस्कटियर्स (The Three Musketeers)
सैयद मुहम्मद लतीफ, कन्हैया लाल और नूर अहमद चिश्ती लाहौर के 'थ्री मस्कटियर्स' कहलाते हैं।
लतीफ का काम कन्हैया लाल (1884) पर आधारित था, जो नूर अहमद चिश्ती (1867) के काम पर आधारित था। चिश्ती ने अपनी जानकारी मौखिक कहानियों और 1860 के एक अंग्रेजी मोनोग्राफ से ली थी। जो चिश्ती की कहानियों से शुरू हुआ, वह लतीफ की अंग्रेजी किताब तक पहुँचते-पहुँचते "स्थापित इतिहास" बन गया। यह पंजाब के इतिहास के साथ अन्याय है। इतिहासकार नाधरा खान ने भी अपनी 2018 की पुस्तक में इसी तरह के विचार व्यक्त किए हैं।
भ्रामक दावों के तीन उदाहरण:
क्या लाहौर का नाम भगवान राम के पुत्र के नाम पर है? चिश्ती, लाल और लतीफ तीनों का दावा है कि लाहौर का नाम 'लव' (लोह) के नाम पर पड़ा। लेकिन 982 ईस्वी की फारसी पांडुलिपि "हुदूद अल-आलम" में लाहौर नाम मिलता है, और 700 साल तक इसका संबंध 'लव' से नहीं जोड़ा गया। यह मिथक पहली बार 1696 में सुजान राय भंडारी ने पेश किया। किले में मौजूद 'लोह का मंदिर' वास्तव में सिख काल का एक हिंदू मंदिर या समाधि है।
बादशाही मस्जिद का फर्श: दावा किया जाता है कि रणजीत सिंह ने मस्जिद का फर्श उखाड़कर शीश महल में लगाया। लेकिन जे.पी. वोगल (1911) के अनुसार, यह पत्थर शहर की एक हवेली से खरीदा गया था, न कि मस्जिद से लिया गया था।
स्वर्ण मंदिर (अमृतसर) का संगमरमर: मिथक है कि लाहौर की मुगल इमारतों का पत्थर अमृतसर में इस्तेमाल हुआ। जबकि सिख शासन के अदालती रिकॉर्ड (फरवरी 1835) स्पष्ट करते हैं कि महाराजा ने जयपुर (राजस्थान) से संगमरमर मंगवाने के आदेश दिए थे।
निष्कर्ष:
इन लेखकों के काम का महत्व उनके द्वारा दिए गए स्मारकों के विस्तृत विवरण में है, न कि उनके द्वारा बताए गए इतिहास में। लाहौर के इतिहास को पक्षपाती और मौखिक कहानियों के बजाय अब स्वतंत्र और ठोस ऐतिहासिक शोध के आधार पर फिर से लिखने की आवश्यकता है।
Posted By: GURBHEJ SINGH ANANDPURI








