वंदे मातरम्’ गाने की अनिवार्यता सिख सिद्धांतों के विरुद्ध: सरबत खालसा जत्थेबंदी
- इंटरनेशनल
- (Asia/Kolkata)
नई दिल्ली (नज़राना टाइम्स) — सरबत खालसा जत्थेबंदी ने भारत सरकार के गृह मंत्रालय (MHA) को आपत्ति पत्र भेजते हुए कहा है कि नागरिकों की धार्मिक मान्यताओं और अंतरात्मा की स्वतंत्रता की परवाह किए बिना “वंदे मातरम्” गाने को सभी के लिए अनिवार्य बनाने के किसी भी प्रयास का वह कड़ा विरोध करती है।
जत्थेबंदी ने कहा कि भारत अनेक धर्मों, दर्शनों, भाषाओं और संस्कृतियों वाला विविधतापूर्ण देश है। इसलिए सरकार को ऐसे कदम उठाने से पहले संबंधित धार्मिक और सांस्कृतिक समुदायों से विचार-विमर्श करना चाहिए, जिनका उनकी मूल धार्मिक मान्यताओं से टकराव हो सकता है।
सरबत खालसा जत्थेबंदी के अनुसार, भारत की विविध आबादी पर एक समान प्रतीकों को थोपने का प्रयास संविधान के धर्मनिरपेक्ष और बहुलतावादी स्वरूप के विपरीत है। जत्थेबंदी ने विशेष रूप से उस स्थिति पर चिंता जताई, जिसमें ब्राह्मणवादी परंपरा से जुड़े सांस्कृतिक या धार्मिक विचारों को ऐसे सार्वभौमिक प्रतीकों के रूप में प्रस्तुत किया जाए जिन्हें हर नागरिक से स्वीकार करने की अपेक्षा हो।
सिख केवल एक सृष्टिकर्ता के आगे शीश झुकाते हैं
जत्थेबंदी ने कहा कि धार्मिक अंतरात्मा के आधार पर सिखों को “वंदे मातरम्” गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता और इसके पीछे दो मूल कारण हैं।
पहला कारण बताते हुए जत्थेबंदी ने कहा कि सिखी का मूल सिद्धांत एक सृष्टिकर्ता के प्रति समर्पण पर आधारित है, जो अजूनी है—अर्थात जन्म से परे है और अवतार धारण नहीं करता।
जत्थेबंदी के अनुसार, सिख सिद्धांत सृष्टि, मनुष्यों, मूर्तियों, देवी-देवताओं या किसी भौगोलिक क्षेत्र को दिव्य मानकर उसकी पूजा करने की अनुमति नहीं देता।
जत्थेबंदी ने कहा, “जिस धरती पर हम रहते हैं, उससे प्रेम किया जा सकता है, उसकी रक्षा और सेवा की जा सकती है, लेकिन उसे धार्मिक पूजा का विषय नहीं बनाया जा सकता।”
जत्थेबंदी ने कहा कि “वंदे मातरम्” के बाद के छंदों में माता को दिव्य स्वरूप में प्रस्तुत करते हुए दुर्गा, कमला और वाणी का उल्लेख किया गया है।
उसने कहा कि ऐसा धार्मिक प्रतीकवाद उन ब्राह्मणवादी धार्मिक परंपराओं के लिए अर्थपूर्ण और पूरी तरह स्वीकार्य हो सकता है जो इन मान्यताओं को मानती हैं। उन परंपराओं के अनुयायियों को अपने धार्मिक विश्वास व्यक्त करने का पूरा अधिकार है। लेकिन ऐसी अवधारणाओं को सिखों या अन्य धर्मों के अनुयायियों पर नहीं थोपा जा सकता, जिनकी धार्मिक शिक्षाएं इस प्रकार की पूजा की अनुमति नहीं देतीं।
जत्थेबंदी ने कहा, “सिख केवल एक सृष्टिकर्ता के आगे शीश झुकाते हैं और सृष्टि की सेवा को धार्मिक कर्तव्य मानते हैं; वे सृष्टि को सृष्टिकर्ता का दर्जा नहीं देते।”
‘आनंदमठ’ के ऐतिहासिक संदर्भ पर भी आपत्ति
जत्थेबंदी की दूसरी आपत्ति “वंदे मातरम्” के बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय के 1882 में प्रकाशित उपन्यास ‘आनंदमठ’ का हिस्सा होने के ऐतिहासिक संदर्भ से जुड़ी है।
जत्थेबंदी ने कहा कि कई विद्वानों और टिप्पणीकारों ने उपन्यास के कुछ अंशों की आलोचना की है, जिन्हें वे मुस्लिम-विरोधी और शत्रुतापूर्ण चित्रण मानते हैं। ऐसे चित्रणों को सांप्रदायिक तनाव और धार्मिक ध्रुवीकरण में योगदान देने वाला भी माना गया है।
जत्थेबंदी ने कहा कि सिख दृष्टिकोण ऐसी सोच के स्पष्ट रूप से विपरीत है।
‘सरबत दा भला’ सिखी का अभिन्न सिद्धांत
सरबत खालसा जत्थेबंदी ने कहा कि “सरबत दा भला”—धर्म, जाति, नस्ल, राष्ट्रीयता या लिंग के आधार पर किसी भेदभाव के बिना पूरी मानवता की भलाई—सिखों की दैनिक अरदास का अभिन्न हिस्सा है।
जत्थेबंदी ने कहा कि हम सभी का सृष्टिकर्ता एक है और वह निरवैर, अर्थात किसी से वैर न रखने वाला है।
इसलिए सिखों से ऐसे धार्मिक-राष्ट्रवादी प्रतीकवाद को अपनाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती, जो जत्थेबंदी के अनुसार मानवता की भलाई, निरवैरता, समानता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता के प्रति सिख प्रतिबद्धता से टकराता हो।
‘देशभक्ति काम से दिखाई जाए, थोपे गए प्रतीकों से नहीं’
सरबत खालसा जत्थेबंदी ने कहा कि सरकार को देशभक्ति के केवल प्रतीकात्मक प्रदर्शनों से ऊपर उठकर सार्थक कार्यों के माध्यम से राष्ट्र के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दिखानी चाहिए।
जत्थेबंदी ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने, पारदर्शिता और जवाबदेही पर आधारित भ्रष्टाचार-मुक्त प्रशासन सुनिश्चित करने, प्राकृतिक संसाधनों को प्रदूषण और एकाधिकारवादी शोषण से बचाने, संवैधानिक स्वतंत्रताओं की रक्षा करने तथा प्रत्येक नागरिक के लिए न्याय और समानता सुनिश्चित करने पर जोर दिया।
जत्थेबंदी ने भारत सरकार और गृह मंत्रालय से आग्रह किया कि किसी भी सिख या किसी अन्य धर्म अथवा मान्यता से संबंधित नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध “वंदे मातरम्” गाने के लिए मजबूर न किया जाए।
साथ ही उसने मांग की कि धार्मिक आधार पर इसे गाने से इनकार करने वाले किसी व्यक्ति को दंडित न किया जाए और न ही उसके साथ किसी प्रकार का भेदभाव हो।
जत्थेबंदी ने कहा, “एकता तब मजबूत होती है जब अलग-अलग मान्यताओं वाले नागरिकों के साथ समान व्यवहार किया जाता है और वे अपनी धार्मिक अंतरात्मा से समझौता किए बिना राष्ट्र की प्रगति में पूरी तरह भाग ले सकते हैं।”
यह आपत्ति कौम के हित और गुरमत के मार्गदर्शन में पंज-प्रधान काउंसिल की ओर से जारी की गई है, जिसमें स. निर्मल सिंह (विक्टोरिया, कनाडा), स. गुरप्रीत सिंह जीपी (बहरीन), डॉ. खुशहाल सिंह (चंडीगढ़), ज्ञानी अमृतपाल सिंह (लुधियाना) और स. सतबीर सिंह (दिल्ली) शामिल हैं।
Leave a Reply